- **ओवैसी ने MP हाई कोर्ट के फ़ैसले पर हमला बोला; आरोप लगाया: "सरकार और ASI आपस में साज़िश कर रहे हैं"**

**ओवैसी ने MP हाई कोर्ट के फ़ैसले पर हमला बोला; आरोप लगाया:

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि 1995 में, धार के कुछ प्रभावशाली मुसलमानों ने यह मानकर एक गलती की थी कि उन्हें हर मंगलवार और बसंत पंचमी को मस्जिद के अंदर नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी जाएगी।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला परिसर से जुड़े विवाद के संबंध में कड़े बयान दिए हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ आवाज़ उठाई, जिसमें विवादित स्थल को एक मंदिर घोषित किया गया था। उन्होंने केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पर भी निशाना साधा।

छह मुख्य बिंदुओं का हवाला देते हुए, ओवैसी ने तर्क दिया कि अदालत का फैसला गलत था। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह मस्जिद 700 वर्षों से इस स्थल पर मौजूद है और यहाँ नियमित रूप से नमाज़ पढ़ी जाती है। उन्होंने आगे कहा कि यह एक वक्फ संपत्ति है, जिसे धार की तत्कालीन रियासत द्वारा मुस्लिम समुदाय को दिया गया था। उन्होंने 1935 के धार रियासत गजट का संदर्भ दिया, जिसमें इस स्थल को स्पष्ट रूप से एक मस्जिद के रूप में पहचाना गया है।


**ओवैसी ने अदालत के फैसले को गलत बताया**

असदुद्दीन ओवैसी ने यह भी तर्क दिया कि 1985 का वक्फ गजट और पूजा स्थल अधिनियम, 1991, इस स्थल के उस धार्मिक स्वरूप की रक्षा करते हैं जो 15 अगस्त, 1947 को मौजूद था। उन्होंने आगे कहा कि 1951 और 1952 में जारी ASI के आदेशों ने पहले ही इसके मस्जिद होने की स्थिति की पुष्टि कर दी थी और 'भोज उत्सव' (त्योहार) के लिए अनुमति मांगने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था।


उन्होंने अदालत के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताया, और कहा कि इसने 1935 के गजट, वक्फ पंजीकरण और 'पूजा स्थल अधिनियम' की अनदेखी की है। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मोदी सरकार और ASI याचिकाकर्ताओं के साथ मिलीभगत कर रहे हैं—एक ऐसा कृत्य जिसे उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 और 12 का उल्लंघन बताया।

**अदालत के फैसले के बाद ओवैसी की टिप्पणियाँ**

ओवैसी ने ये टिप्पणियाँ तब कीं जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार (15 मई, 2026) को भोजशाला परिसर के संबंध में अपना फैसला सुनाया। अदालत ने विवादित क्षेत्र को एक मंदिर घोषित कर दिया। ओवैसी की प्रतिक्रिया फैसले के तुरंत बाद आई। यह विवाद मध्य प्रदेश के धार ज़िले में स्थित एक जगह को लेकर है। इस जगह को भोजशाला परिसर के नाम से जाना जाता है। इसका एक हिस्सा मस्जिद के तौर पर इस्तेमाल होता है, जहाँ मुसलमान *नमाज़* (प्रार्थना) अदा करते हैं। अदालत के आदेश से इस विवादित जगह की स्थिति बदल गई है।


ओवैसी ने ये बयान अदालत के फ़ैसले को चुनौती देने और मुसलमानों का पक्ष रखने के लिए दिए। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि यह फ़ैसला ऐतिहासिक रिकॉर्ड, वक़्फ़ क़ानूनों और 'पूजा स्थल अधिनियम' (Places of Worship Act) की अनदेखी करता है। उन्होंने सरकार पर पक्षपात का आरोप भी लगाया और कहा कि सरकार ने प्रशासन पर दबाव डाला है। ओवैसी ने अपनी दलीलें एक-एक करके पेश कीं। उन्होंने 1935 के गजट में दर्ज जानकारी के साथ-साथ 1985 के वक़्फ़ पंजीकरण के ब्योरे को भी पढ़कर सुनाया।

**ओवैसी के बयानों के बाद राजनीतिक बहस और तेज़ हुई**

उन्होंने आगे कहा कि 1995 में, धार के कुछ प्रभावशाली मुसलमानों ने एक ग़लती की थी, जब उन्होंने हर मंगलवार और *बसंत पंचमी* के मौक़े पर मस्जिद के अंदर पूजा करने की इजाज़त देने पर सहमति जताई थी। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस सहमति का मक़सद मस्जिद के मूल स्वरूप को बदलना नहीं था। इसके बाद, उन्होंने अदालत पर आरोप लगाया कि उसने 1935 की अधिसूचना को महज़ एक "प्रशासनिक व्यवस्था" कहकर ख़ारिज कर दिया—एक ऐसा वर्णन जिसे उन्होंने बेतुका बताया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जनहित याचिका (PIL) अपने आप में ही दोषपूर्ण थी। उनके बयानों ने अब इस मुद्दे को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को और भी तेज़ कर दिया है।


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