चुनाव आयोग के सूत्रों ने बताया है कि आयोग के सभी फैसलों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के हस्ताक्षर होते हैं।
भारत के चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सिंह ने दावा किया कि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के बाद से चुनाव आयोग भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एक संगठन की तरह काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया ने इस धारणा को और मजबूत किया है।
दिग्विजय सिंह ने कहा, "मैं यह कहना चाहता हूं कि जब से ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया है, चुनाव आयोग भारतीय जनता पार्टी के संगठन की तरह काम कर रहा है। जिस तरह से स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) किया गया है, उससे यह बात और भी साफ हो गई है।"
चुनाव आयोग में तीन आयुक्तों - जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं - की भूमिकाओं का जिक्र करते हुए कांग्रेस नेता ने दावा किया कि प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त तीन आयुक्तों में से दो ने SIR प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी। सिंह के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इन आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया।
'यह बताने की जरूरत नहीं कि लिस्ट कहां से आती है'
उन्होंने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के तहत पहले से ही एक लिस्ट तैयार की जाती है जिसमें यह बताया जाता है कि किन मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने हैं और किनके जोड़ने हैं। सिंह ने कहा कि इस लिस्ट के स्रोत के बारे में बताने की कोई जरूरत नहीं है।
कांग्रेस नेता ने कहा, "आरोप यह है कि SIR इस तरह से किया जा रहा है कि ज्ञानेश कुमार को पहले से ही कंप्यूटर से बनी एक लिस्ट दी जाती है, जिसमें वोटर लिस्ट से नाम हटाने या जोड़ने का विवरण होता है। मुझे आपको यह बताने की जरूरत नहीं है कि ऐसी लिस्ट कहां से आती है। फिर उस लिस्ट के आधार पर SIR किया जाता है।"
आरोपों पर ECI ने क्या कहा? इस बीच, दिग्विजय सिंह के आरोप ऐसे समय में सामने आए हैं जब चुनाव आयोग ने एक प्रमुख अखबार में छपी उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां जताई थीं।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ये आपत्तियां विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं से संबंधित थीं। बताई गई समस्याओं में ऐसे मामले शामिल थे जिनमें चुनाव आयुक्तों को फैसलों के बारे में जानकारी नहीं दी गई, साथ ही नए वोटरों को जोड़ने या वोटर लिस्ट से नाम हटाने से जुड़े मामले भी शामिल थे।